भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये इस प्रकार प्रेरणा की, परन्तु अर्जुनका हृदय महान् था। यद्यपि अश्वत्थामाने उनके पुत्रोंकी हत्या की थी, फिर भी अर्जुनके मनमें गुरुपुत्रको मारनेकी इच्छा नहीं हुई ॥ ४०॥✎ 666768
एवं परीक्षता धर्मं पार्थः कृष्णेन चोदितः।
नैच्छद्धन्तुं गुरुसुतं यद्यप्यात्महनं महान्॥ ४०
भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनके धर्मकी परीक्षा लेनेके लिये इस प्रकार प्रेरणा की, परन्तु अर्जुनका हृदय महान् था। यद्यपि अश्वत्थामाने उनके पुत्रोंकी हत्या की थी, फिर भी अर्जुनके मनमें गुरुपुत्रको मारनेकी इच्छा नहीं हुई ॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.7.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 111) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/1/7/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)