श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.7.42

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तथाऽऽहृतं पशुवत् पाशबद्ध-

मवाङ्मुखं कर्मजुगुप्सितेन।

निरीक्ष्य कृष्णापकृतं गुरोः सुतं

वामस्वभावा कृपया ननाम च॥ ४२

tathā''hṛtaṃ paśuvat pāśabaddha-

mavāṅmukhaṃ karmajugupsitena|

nirīkṣya kṛṣṇāpakṛtaṃ guroḥ sutaṃ

vāmasvabhāvā kṛpayā nanāma ca|| 42

अर्थ

द्रौपदीने देखा कि अश्‍वत्थामा पशुकी तरह बाँधकर लाया गया है। निन्दित कर्म करनेके कारण उसका मुख नीचेकी ओर झुका हुआ है। अपना अनिष्ट करनेवाले गुरुपुत्र अश्‍वत्थामाको इस प्रकार अपमानित देखकर द्रौपदीका कोमल हृदय कृपासे भर आया और उसने अश्‍वत्थामाको नमस्कार किया॥ ४२॥

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