श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.39

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नेयं शोभिष्यते तत्र यथेदानीं गदाधर।

त्वत्पदैरङ्किता भाति स्वलक्षणविलक्षितैः॥ ३९

neyaṃ śobhiṣyate tatra yathedānīṃ gadādhara|

tvatpadairaṅkitā bhāti svalakṣaṇavilakṣitaiḥ|| 39

अर्थ

गदाधर! आपके विलक्षण चरणचिह्नोंसे चिह्नित यह कुरुजांगल-देशकी भूमि आज जैसी शोभायमान हो रही है, वैसी आपके चले जानेके बाद न रहेगी॥ ३९॥✎ 1574

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1574 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अग्‍नि-स्वरूप → अग्‍निस्वरूप

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें