श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.40

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

इमे जनपदाः स्वृद्धाः सुपक्वौषधिवीरुधः।

वनाद्रिनद्युदन्वन्तो ह्येधन्ते तव वीक्षितैः४॥ ४०

ime janapadāḥ svṛddhāḥ supakvauṣadhivīrudhaḥ|

vanādrinadyudanvanto hyedhante tava vīkṣitaiḥ|| 40

अर्थ

आपकी दृष्टिके प्रभावसे ही यह देश पकी हुई फसल तथा लता-वृक्षोंसे समृद्ध हो रहा है। ये वन, पर्वत, नदी और समुद्र भी आपकी दृष्टिसे ही वृद्धिको प्राप्त हो रहे हैं॥ ४०॥✎ 1574

टिप्पणियाँ

  1. ४

    प्रा० पा०—वीक्षिताः।

    (मुद्रित पृष्ठ 117)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1574 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अग्‍नि-स्वरूप → अग्‍निस्वरूप

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