‘धर्मपुत्रो! हाय! हाय! यह बड़े कष्ट और अन्यायकी बात है कि तुमलोगोंको ब्राह्मण, धर्म और भगवान्के आश्रित रहनेपर भी इतने कष्टके साथ जीना पड़ा, जिसके तुम कदापि योग्य नहीं थे॥ १२॥✎ 1575
अहो कष्टमहोऽन्याय्यं यद्यूयं धर्मनन्दनाः।
जीवितुं नार्हथ क्लिष्टं विप्रधर्माच्युताश्रयाः॥ १२
‘धर्मपुत्रो! हाय! हाय! यह बड़े कष्ट और अन्यायकी बात है कि तुमलोगोंको ब्राह्मण, धर्म और भगवान्के आश्रित रहनेपर भी इतने कष्टके साथ जीना पड़ा, जिसके तुम कदापि योग्य नहीं थे॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 120) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/12/