॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.9.24
स देवदेवो भगवान् प्रतीक्षतां
कलेवरं यावदिदं हिनोम्यहम्।
प्रसन्नहासारुणलोचनोल्लस-
न्मुखाम्बुजो ध्यानपथश्चतुर्भुजः॥ २४
sa devadevo bhagavān pratīkṣatāṃ
kalevaraṃ yāvadidaṃ hinomyaham|
prasannahāsāruṇalocanollasa-
nmukhāmbujo dhyānapathaścaturbhujaḥ|| 24
अर्थ
वे ही देवदेव भगवान् अपने प्रसन्न हास्य और रक्तकमलके समान अरुण नेत्रोंसे उल्लसित मुखवाले चतुर्भुजरूपसे, जिसका और लोगोंको केवल ध्यानमें दर्शन होता है, तबतक यहीं स्थित रहकर प्रतीक्षा करें जबतक मैं इस शरीरका त्याग न कर दूँ॥ २४॥