श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.28

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

धर्मार्थकाममोक्षांश्‍च सहोपायान् यथा मुने।

नानाख्यानेतिहासेषु वर्णयामास तत्त्ववित्॥ २८

dharmārthakāmamokṣāṃśca sahopāyān yathā mune|

nānākhyānetihāseṣu varṇayāmāsa tattvavit|| 28

अर्थ

तब तत्त्ववेत्ता भीष्मपितामहने वर्ण और आश्रमके अनुसार पुरुषके स्वाभाविक धर्म और वैराग्य तथा रागके कारण विभिन्‍नरूपसे बतलाये हुए निवृत्ति और प्रवृत्तिरूप द्विविध धर्म, दानधर्म, राजधर्म, मोक्षधर्म, स्त्रीधर्म और भगवद्धर्म—इन सबका अलग-अलग संक्षेप और विस्तारसे वर्णन किया। शौनकजी! इनके साथ ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंका तथा इनकी प्राप्तिके साधनोंका अनेकों उपाख्यान और इतिहास सुनाते हुए विभागशः वर्णन किया॥ २६—२८॥✎ 72 73

यह अर्थ श्लोक 26–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #72 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #73 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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