श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.29

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

धर्मं प्रवदतस्तस्य स कालः प्रत्युपस्थितः।

यो योगिनश्छन्दमृत्योर्वाञ्छितस्तूत्तरायणः॥ २९

dharmaṃ pravadatastasya sa kālaḥ pratyupasthitaḥ|

yo yoginaśchandamṛtyorvāñchitastūttarāyaṇaḥ|| 29

अर्थ

भीष्मपितामह इस प्रकार धर्मका प्रवचन कर ही रहे थे कि वह उत्तरायणका समय आ पहुँचा जिसे मृत्युको अपने अधीन रखनेवाले भगवत्परायण योगीलोग चाहा करते हैं॥ २९॥✎ 72 73

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #72 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #73 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें