श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.30

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

तदोपसंहृत्य गिरः सहस्रणीर्विमुक्तसङ्गं१ मन आदिपूरुषे।✎ 1508

कृष्णे लसत्पीतपटे चतुर्भुजे पुरःस्थितेऽमीलितदृग्व्यधारयत्॥ ३०

tadopasaṃhṛtya giraḥ sahasraṇīrvimuktasaṅgaṃ mana ādipūruṣe|

kṛṣṇe lasatpītapaṭe caturbhuje puraḥsthite'mīlitadṛgvyadhārayat|| 30

अर्थ

उस समय हजारों रथियोंके नेता भीष्मपितामहने वाणीका संयम करके मनको सब ओरसे हटाकर अपने सामने स्थित आदिपुरुष भगवान् श्रीकृष्णमें लगा दिया। भगवान् श्रीकृष्णके सुन्दर चतुर्भुज विग्रहपर उस समय पीताम्बर फहरा रहा था। भीष्मजीकी आँखें उसीपर एकटक लग गयीं॥ ३०॥✎ 72 73

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—विमुक्तसङ्गो।

    (मुद्रित पृष्ठ 122)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #72 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #73 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #1508 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सहस्रणी- र्विमुक्तसङ्गं → सहस्रणीर्विमुक्तसङ्गं

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