॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 1.9.35
सपदि सखिवचो निशम्य मध्ये निजपरयोर्बलयो रथं निवेश्य।
स्थितवति परसैनिकायुरक्ष्णा हृतवति पार्थसखे रति१र्ममास्तु॥ ३५
sapadi sakhivaco niśamya madhye nijaparayorbalayo rathaṃ niveśya|
sthitavati parasainikāyurakṣṇā hṛtavati pārthasakhe ratirmamāstu|| 35
अर्थ
अपने मित्र अर्जुनकी बात सुनकर, जो तुरंत ही पाण्डव-सेना और कौरव-सेनाके बीचमें अपना रथ ले आये और वहाँ स्थित होकर जिन्होंने अपनी दृष्टिसे ही शत्रुपक्षके सैनिकोंकी आयु छीन ली, उन पार्थसखा भगवान् श्रीकृष्णमें मेरी परम प्रीति हो॥ ३५॥
टिप्पणियाँ
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प्रा० पा०—नति०।