श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.36

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

व्य२वहितपृतनामुखं निरीक्ष्य स्वजनवधाद्विमुखस्य दोषबुद्ध्या३।

कुमतिमहरदात्मविद्यया यश्‍चरणरतिः परमस्य तस्य मेऽस्तु॥ ३६✎ 1513

vyavahitapṛtanāmukhaṃ nirīkṣya svajanavadhādvimukhasya doṣabuddhyā|

kumatimaharadātmavidyayā yaścaraṇaratiḥ paramasya tasya me'stu|| 36

अर्थ

अर्जुनने जब दूरसे कौरवोंकी सेनाके मुखिया हमलोगोंको देखा तब पाप समझकर वह अपने स्वजनोंके वधसे विमुख हो गया। उस समय जिन्होंने गीताके रूपमें आत्मविद्याका उपदेश करके उसके सामयिक अज्ञानका नाश कर दिया, उन परमपुरुष भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें मेरी प्रीति बनी रहे॥ ३६॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    प्रा० पा०—व्यवसित०।

    (मुद्रित पृष्ठ 123)
  2. ३

    प्रा० पा०—धर्मबुद्ध्या।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 123)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1513 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: य- श्‍चरणरति: → यश्‍चरणरतिः

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