श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

स्वनिगममपहाय मत्प्रतिज्ञामृतमधिकर्तुमवप्लुतो रथस्थः।✎ 1514

धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद‍्गुर्हरिरिव हन्तुमिभं गतोत्तरीयः॥ ३७✎ 1515

svanigamamapahāya matpratijñāmṛtamadhikartumavapluto rathasthaḥ|

dhṛtarathacaraṇo'bhyayāccaladgurhaririva hantumibhaṃ gatottarīyaḥ|| 37

अर्थ

मैंने प्रतिज्ञा कर ली थी कि मैं श्रीकृष्णको शस्त्र ग्रहण कराकर छोड़ूँगा; उसे सत्य एवं ऊँची करनेके लिये उन्होंने अपनी शस्त्र ग्रहण न करनेकी प्रतिज्ञा तोड़ दी। उस समय वे रथसे नीचे कूद पड़े और सिंह जैसे हाथीको मारनेके लिये उसपर टूट पड़ता है, वैसे ही रथका पहिया लेकर मुझपर झपट पड़े। उस समय वे इतने वेगसे दौड़े कि उनके कंधेका दुपट्टा गिर गया और पृथ्वी काँपने लगी॥ ३७॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1514 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मत्प्रतिज्ञा- मृतमधिकर्तुमवप्लुतो → मत्प्रतिज्ञामृतमधिकर्तुमवप्लुतो
  • #1515 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद‍्गु- र्हरिरिव → धृतरथचरणोऽभ्ययाच्चलद‍्गुर्हरिरिव

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