श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.38

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

शितविशिखहतो विशीर्णदंशः क्षतजपरिप्लुत आततायिनो मे।

प्रसभमभिससार मद्वधार्थं स भवतु मे भगवान् गतिर्मुकुन्दः॥ ३८

śitaviśikhahato viśīrṇadaṃśaḥ kṣatajaparipluta ātatāyino me|

prasabhamabhisasāra madvadhārthaṃ sa bhavatu me bhagavān gatirmukundaḥ|| 38

अर्थ

मुझ आततायीने तीखे बाण मार-मारकर उनके शरीरका कवच तोड़ डाला था, जिससे सारा शरीर लहूलुहान हो रहा था, अर्जुनके रोकनेपर भी वे बलपूर्वक मुझे मारनेके लिये मेरी ओर दौड़े आ रहे थे। वे ही भगवान् श्रीकृष्ण, जो ऐसा करते हुए भी मेरे प्रति अनुग्रह और भक्तवत्सलतासे परिपूर्ण थे, मेरी एकमात्र गति हों—आश्रय हों॥ ३८॥

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