मुने! मैंने श्रीकृष्णकी जितनी लीलाएँ पूछी हैं और जो नहीं पूछी हैं, वे सब आप मुझे विस्तारसे सुनाइये; क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं और मैं बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहता हूँ॥ १२॥
एतदन्यच्च सर्वं मे मुने कृष्णविचेष्टितम्।
वक्तुमर्हसि सर्वज्ञ श्रद्दधानाय विस्तृतम्॥ १२
मुने! मैंने श्रीकृष्णकी जितनी लीलाएँ पूछी हैं और जो नहीं पूछी हैं, वे सब आप मुझे विस्तारसे सुनाइये; क्योंकि आप सब कुछ जानते हैं और मैं बड़ी श्रद्धाके साथ उन्हें सुनना चाहता हूँ॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 121) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/1/12/