देवकीके पिता थे देवक। अपनी पुत्रीपर उनका बड़ा प्रेम था। कन्याको विदा करते समय उन्होंने उसे सोनेके हारोंसे अलंकृत चार सौ हाथी, पंद्रह हजार घोड़े, अठारह सौ रथ तथा सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दो सौ सुकुमारी दासियाँ दहेजमें दीं॥ ३१-३२॥✎ 8821651
यह अर्थ श्लोक 31–32 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
दासीनां सुकुमारीणां द्वे शते समलंकृते।
दुहित्रे देवकः प्रादाद् याने दुहितृवत्सलः॥ ३२
देवकीके पिता थे देवक। अपनी पुत्रीपर उनका बड़ा प्रेम था। कन्याको विदा करते समय उन्होंने उसे सोनेके हारोंसे अलंकृत चार सौ हाथी, पंद्रह हजार घोड़े, अठारह सौ रथ तथा सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे विभूषित दो सौ सुकुमारी दासियाँ दहेजमें दीं॥ ३१-३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 123) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/1/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)