श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तं जुगुप्सितकर्माणं नृशंसं निरपत्रपम्।

वसुदेवो महाभाग उवाच परिसान्त्वयन्॥ ३६

taṃ jugupsitakarmāṇaṃ nṛśaṃsaṃ nirapatrapam|

vasudevo mahābhāga uvāca parisāntvayan|| 36

अर्थ

वह अत्यन्त क्रूर तो था ही, पाप-कर्म करते-करते निर्लज्ज भी हो गया था। उसका यह काम देखकर महात्मा वसुदेवजी उसको शान्त करते हुए बोले—॥ ३६॥✎ 882 1651

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #882 शब्दोंके बीचका स्थान: ३५॥वह → ३५॥ वह
  • #1651 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वस्त्रा-भूषणोंसे → वस्त्राभूषणोंसे

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