वह अत्यन्त क्रूर तो था ही, पाप-कर्म करते-करते निर्लज्ज भी हो गया था। उसका यह काम देखकर महात्मा वसुदेवजी उसको शान्त करते हुए बोले—॥ ३६॥✎ 8821651
तं जुगुप्सितकर्माणं नृशंसं निरपत्रपम्।
वसुदेवो महाभाग उवाच परिसान्त्वयन्॥ ३६
वह अत्यन्त क्रूर तो था ही, पाप-कर्म करते-करते निर्लज्ज भी हो गया था। उसका यह काम देखकर महात्मा वसुदेवजी उसको शान्त करते हुए बोले—॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 124) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/36/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)