श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यतो यतो धावति दैवचोदितं

मनो विकारात्मकमाप पंचसु।

गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ

प्रपद्यमानः सह तेन जायते॥ ४२

yato yato dhāvati daivacoditaṃ

mano vikārātmakamāpa paṃcasu|

guṇeṣu māyāraciteṣu dehyasau

prapadyamānaḥ saha tena jāyate|| 42

अर्थ

जीवका मन अनेक विकारोंका पुंज है। देहान्तके समय वह अनेक जन्मोंके संचित और प्रारब्ध कर्मोंकी वासनाओंके अधीन होकर मायाके द्वारा रचे हुए अनेक पांचभौतिक शरीरोंमेंसे जिस किसी शरीरके चिन्तनमें तल्लीन हो जाता है और मान बैठता है कि यह मैं हूँ, उसे वही शरीर ग्रहण करके जन्म लेना पड़ता है॥ ४२॥

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