जीवका मन अनेक विकारोंका पुंज है। देहान्तके समय वह अनेक जन्मोंके संचित और प्रारब्ध कर्मोंकी वासनाओंके अधीन होकर मायाके द्वारा रचे हुए अनेक पांचभौतिक शरीरोंमेंसे जिस किसी शरीरके चिन्तनमें तल्लीन हो जाता है और मान बैठता है कि यह मैं हूँ, उसे वही शरीर ग्रहण करके जन्म लेना पड़ता है॥ ४२॥
यतो यतो धावति दैवचोदितं
मनो विकारात्मकमाप पंचसु।
गुणेषु मायारचितेषु देह्यसौ
प्रपद्यमानः सह तेन जायते॥ ४२
जीवका मन अनेक विकारोंका पुंज है। देहान्तके समय वह अनेक जन्मोंके संचित और प्रारब्ध कर्मोंकी वासनाओंके अधीन होकर मायाके द्वारा रचे हुए अनेक पांचभौतिक शरीरोंमेंसे जिस किसी शरीरके चिन्तनमें तल्लीन हो जाता है और मान बैठता है कि यह मैं हूँ, उसे वही शरीर ग्रहण करके जन्म लेना पड़ता है॥ ४२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.42 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 124) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/1/42/