श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

ज्योतिर्यथैवोदकपार्थिवेष्वदः

समीरवेगानुगतं विभाव्यते।

एवं स्वमायारचितेष्वसौ पुमान्

गुणेषु रागानुगतो विमुह्यति॥ ४३

jyotiryathaivodakapārthiveṣvadaḥ

samīravegānugataṃ vibhāvyate|

evaṃ svamāyāraciteṣvasau pumān

guṇeṣu rāgānugato vimuhyati|| 43

अर्थ

जैसे सूर्य, चन्द्रमा आदि चमकीली वस्तुएँ जलसे भरे हुए घड़ोंमें या तेल आदि तरल पदार्थोंमें प्रतिबिम्बित होती हैं और हवाके झोंकेसे उनके जल आदिके हिलने-डोलनेपर उनमें प्रतिबिम्बित वस्तुएँ भी चंचल जान पड़ती हैं—वैसे ही जीव अपने स्वरूपके अज्ञानद्वारा रचे हुए शरीरोंमें राग करके उन्हें अपना आप मान बैठता है और मोहवश उनके आने-जानेको अपना आना-जाना मानने लगता है॥ ४३॥

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