श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

तस्मान्‍न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः।

आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम्॥ ४४

tasmānna kasyacid drohamācaret sa tathāvidhaḥ|

ātmanaḥ kṣemamanvicchan drogdhurvai parato bhayam|| 44

अर्थ

इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे किसीसे द्रोह नहीं करना चाहिये; क्योंकि जीव कर्मके अधीन हो गया है और जो किसीसे भी द्रोह करेगा, उसको इस जीवनमें शत्रुसे और जीवनके बाद परलोकसे भयभीत होना ही पड़ेगा॥ ४४॥

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