अपनी बुद्धिके अनुसार ऐसा निश्चय करके वसुदेवजीने बहुत सम्मानके साथ पापी कंसकी बड़ी प्रशंसा की॥ ५२॥
एवं विमृश्य तं पापं यावदात्मनिदर्शनम्।
पूजयामास वै शौरिर्बहुमानपुरःसरम्॥ ५२
अपनी बुद्धिके अनुसार ऐसा निश्चय करके वसुदेवजीने बहुत सम्मानके साथ पापी कंसकी बड़ी प्रशंसा की॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 126) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/52/