परीक्षित्! कंस बड़ा क्रूर और निर्लज्ज था; अतः ऐसा करते समय वसुदेवजीके मनमें बड़ी पीड़ा भी हो रही थी। फिर भी उन्होंने ऊपरसे अपने मुखकमलको प्रफुल्लित करके हँसते हुए कहा—॥ ५३॥
प्रसन्नवदनाम्भोजो नृशंसं निरपत्रपम्।
मनसा दूयमानेन विहसन्निदमब्रवीत्॥ ५३
परीक्षित्! कंस बड़ा क्रूर और निर्लज्ज था; अतः ऐसा करते समय वसुदेवजीके मनमें बड़ी पीड़ा भी हो रही थी। फिर भी उन्होंने ऊपरसे अपने मुखकमलको प्रफुल्लित करके हँसते हुए कहा—॥ ५३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.53 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 126) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/1/53/