पहले पुत्रका नाम था कीर्तिमान्। वसुदेवजीने उसे लाकर कंसको दे दिया। ऐसा करते समय उन्हें कष्ट तो अवश्य हुआ, परन्तु उससे भी बड़ा कष्ट उन्हें इस बातका था कि कहीं मेरे वचन झूठे न हो जायँ॥ ५७॥
कीर्तिमन्तं प्रथमजं कंसायानकदुन्दुभिः।
अर्पयामास कृच्छ्रेण सोऽनृतादतिविह्वलः॥ ५७
पहले पुत्रका नाम था कीर्तिमान्। वसुदेवजीने उसे लाकर कंसको दे दिया। ऐसा करते समय उन्हें कष्ट तो अवश्य हुआ, परन्तु उससे भी बड़ा कष्ट उन्हें इस बातका था कि कहीं मेरे वचन झूठे न हो जायँ॥ ५७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.57 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 126) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/57/