श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.58

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

किं दुःसहं नु साधूनां विदुषां किमपेक्षितम्।

किमकार्यं कदर्याणां दुस्त्यजं किं धृतात्मनाम्॥ ५८

kiṃ duḥsahaṃ nu sādhūnāṃ viduṣāṃ kimapekṣitam|

kimakāryaṃ kadaryāṇāṃ dustyajaṃ kiṃ dhṛtātmanām|| 58

अर्थ

परीक्षित्! सत्यसन्ध पुरुष बड़े-से-बड़ा कष्ट भी सह लेते हैं, ज्ञानियोंको किसी बातकी अपेक्षा नहीं होती, नीच पुरुष बुरे-से-बुरा काम भी कर सकते हैं और जो जितेन्द्रिय हैं—जिन्होंने भगवान्‌को हृदयमें धारण कर रखा है, वे सब कुछ त्याग सकते हैं॥ ५८॥

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