श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तत्रोपनन्दनामाऽऽह गोपो ज्ञानवयोऽधिकः।

देशकालार्थतत्त्वज्ञः प्रियकृद् रामकृष्णयोः॥ २२

tatropanandanāmā''ha gopo jñānavayo'dhikaḥ|

deśakālārthatattvajñaḥ priyakṛd rāmakṛṣṇayoḥ|| 22

अर्थ

उनमेंसे एक गोपका नाम था उपनन्द। वे अवस्थामें तो बड़े थे ही, ज्ञानमें भी बड़े थे। उन्हें इस बातका पता था कि किस समय किस स्थानपर किस वस्तुसे कैसा व्यवहार करना चाहिये। साथ ही वे यह भी चाहते थे कि राम और श्याम सुखी रहें, उनपर कोई विपत्ति न आवे। उन्होंने कहा—॥ २२॥

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