श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तौ वत्सपालकौ भूत्वा सर्वलोकैकपालकौ।

सप्रातराशौ गोवत्सांश्‍चारयन्तौ विचेरतुः॥ ४५

tau vatsapālakau bhūtvā sarvalokaikapālakau|

saprātarāśau govatsāṃścārayantau viceratuḥ|| 45

अर्थ

परीक्षित्! जो सारे लोकोंके एकमात्र रक्षक हैं, वे ही श्याम और बलराम अब वत्सपाल (बछड़ोंके चरवाहे) बने हुए हैं। वे तड़के ही उठकर कलेवेकी सामग्री ले लेते और बछड़ोंको चराते हुए एक वनसे दूसरे वनमें घूमा करते॥ ४५॥

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