इसके बाद भगवान्ने अपने शरीरको इतना बड़ा कर लिया कि उसका गला ही रुँध गया। आँखें उलट गयीं। वह व्याकुल होकर बहुत ही छटपटाने लगा। साँस रुककर सारे शरीरमें भर गयी और अन्तमें उसके प्राण ब्रह्मरन्ध्र फोड़कर निकल गये॥ ३१॥✎ 1659
ततोऽतिकायस्य निरुद्धमार्गिणो
ह्युद्गीर्णदृष्टेर्भ्रमतस्त्वितस्ततः ।
पूर्णोऽन्तरंगे पवनो निरुद्धो
मूर्धन् विनिष्पाट्य विनिर्गतो बहिः॥ ३१
इसके बाद भगवान्ने अपने शरीरको इतना बड़ा कर लिया कि उसका गला ही रुँध गया। आँखें उलट गयीं। वह व्याकुल होकर बहुत ही छटपटाने लगा। साँस रुककर सारे शरीरमें भर गयी और अन्तमें उसके प्राण ब्रह्मरन्ध्र फोड़कर निकल गये॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.12.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 208) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/12/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)