श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तेनैव सर्वेषु बहिर्गतेषु

प्राणेषु वत्सान् सुहृदः परेतान्।

दृष्ट्या स्वयोत्थाप्य तदन्वितः पुन-

र्वक्त्रान्मुकुन्दो भगवान् विनिर्ययौ॥ ३२

tenaiva sarveṣu bahirgateṣu

prāṇeṣu vatsān suhṛdaḥ paretān|

dṛṣṭyā svayotthāpya tadanvitaḥ puna-

rvaktrānmukundo bhagavān viniryayau|| 32

अर्थ

उसी मार्गसे प्राणोंके साथ उसकी सारी इन्द्रियाँ भी शरीरसे बाहर हो गयीं। उसी समय भगवान् मुकुन्दने अपनी अमृतमयी दृष्टिसे मरे हुए बछड़ों और ग्वालबालोंको जिला दिया और उन सबको साथ लेकर वे अघासुरके मुँहसे बाहर निकल आये॥ ३२॥✎ 1659

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1659 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: ब्रह्म-लोकके → ब्रह्मलोकके

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