॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.12.38
नैतद् विचित्रं मनुजार्भमायिनः
परावराणां परमस्य वेधसः।
अघोऽपि यत्स्पर्शनधौतपातकः
प्रापात्मसाम्यं त्वसतां सुदुर्लभम्॥ ३८
naitad vicitraṃ manujārbhamāyinaḥ
parāvarāṇāṃ paramasya vedhasaḥ|
agho'pi yatsparśanadhautapātakaḥ
prāpātmasāmyaṃ tvasatāṃ sudurlabham|| 38
अर्थ
अघासुर मूर्तिमान् अघ (पाप) ही था। भगवान्के स्पर्शमात्रसे उसके सारे पाप धुल गये और उसे उस सारूप्य-मुक्तिकी प्राप्ति हुई, जो पापियोंको कभी मिल नहीं सकती। परन्तु यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है। क्योंकि मनुष्य-बालककी-सी लीला रचनेवाले ये वे ही परमपुरुष परमात्मा हैं, जो व्यक्त-अव्यक्त और कार्य-कारणरूप समस्त जगत्के एकमात्र विधाता हैं॥ ३८॥