श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सकृद् यदंगप्रतिमान्तराहिता

मनोमयी भागवतीं ददौ गतिम्।

स एव नित्यात्मसुखानुभूत्यभि-

व्युदस्तमायोऽन्तर्गतो हि किं पुनः॥ ३९

sakṛd yadaṃgapratimāntarāhitā

manomayī bhāgavatīṃ dadau gatim|

sa eva nityātmasukhānubhūtyabhi-

vyudastamāyo'ntargato hi kiṃ punaḥ|| 39

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णके किसी एक अंगकी भावनिर्मित प्रतिमा यदि ध्यानके द्वारा एक बार भी हृदयमें बैठा ली जाय तो वह सालोक्य, सामीप्य आदि गतिका दान करती है, जो भगवान्‌के बड़े-बड़े भक्तोंको मिलती है। भगवान् आत्मानन्दके नित्य साक्षात्कारस्वरूप हैं। माया उनके पासतक नहीं फटक पाती। वे ही स्वयं अघासुरके शरीरमें प्रवेश कर गये। क्या अब भी उसकी सद्गतिके विषयमें कोई सन्देह है?॥ ३९॥

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