सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! यदुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने ही राजा परीक्षित्को जीवन दान दिया था । उन्होंने जब अपने रक्षक एवं जीवनसर्वस्वका यह विचित्र चरित्र सुना, तब उन्होंने फिर श्रीशुकदेवजी महाराजसे उन्हींकी पवित्र लीलाके सम्बन्धमें प्रश्न किया। इसका कारण यह था कि भगवान्की अमृतमयी लीलाने परीक्षित्के चित्तको अपने वशमें कर रखा था॥ ४०॥✎ 1416
इत्थं द्विजा यादवदेवदत्तः
श्रुत्वा स्वरातुश्चरितं विचित्रम्।
पप्रच्छ भूयोऽपि तदेव पुण्यं
वैयासकिं यन्निगृहीतचेताः॥ ४०
सूतजी कहते हैं—शौनकादि ऋषियो! यदुवंश-शिरोमणि भगवान् श्रीकृष्णने ही राजा परीक्षित्को जीवन दान दिया था । उन्होंने जब अपने रक्षक एवं जीवनसर्वस्वका यह विचित्र चरित्र सुना, तब उन्होंने फिर श्रीशुकदेवजी महाराजसे उन्हींकी पवित्र लीलाके सम्बन्धमें प्रश्न किया। इसका कारण यह था कि भगवान्की अमृतमयी लीलाने परीक्षित्के चित्तको अपने वशमें कर रखा था॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.12.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 209) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/12/40/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1416 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पराक्षित्को → परीक्षित्को