सूतजी कहते हैं—भगवान्के परम प्रेमी भक्तोंमें श्रेष्ठ शौनकजी! जब राजा परीक्षित्ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब श्रीशुकदेवजीको भगवान्की वह लीला स्मरण हो आयी और उनकी समस्त इन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण विवश होकर भगवान्की नित्यलीलामें खिंच गये। कुछ समयके बाद धीरे-धीरे श्रम और कष्टसे उन्हें बाह्यज्ञान हुआ। तब वे परीक्षित्से भगवान्की लीलाका वर्णन करने लगे॥ ४४॥
इत्थं स्म पृष्टः स तु बादरायणि-
स्तत्स्मारितानन्तहृताखिलेन्द्रियः ।
कृच्छ्रात् पुनर्लब्धबहिर्दृशिः शनैः
प्रत्याह तं भागवतोत्तमोत्तम॥ ४४
सूतजी कहते हैं—भगवान्के परम प्रेमी भक्तोंमें श्रेष्ठ शौनकजी! जब राजा परीक्षित्ने इस प्रकार प्रश्न किया, तब श्रीशुकदेवजीको भगवान्की वह लीला स्मरण हो आयी और उनकी समस्त इन्द्रियाँ तथा अन्तःकरण विवश होकर भगवान्की नित्यलीलामें खिंच गये। कुछ समयके बाद धीरे-धीरे श्रम और कष्टसे उन्हें बाह्यज्ञान हुआ। तब वे परीक्षित्से भगवान्की लीलाका वर्णन करने लगे॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.12.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 210) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/12/44/