श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अथ त्रयोदशोऽध्यायः

ब्रह्माजीका मोह और उसका नाश

श्रीशुक उवाच

साधु पृष्टं महाभाग त्वया भागवतोत्तम।

यन्‍नूतनयसीशस्य शृण्वन्‍नपि कथां मुहुः॥ १

sādhu pṛṣṭaṃ mahābhāga tvayā bhāgavatottama|

yannūtanayasīśasya śṛṇvannapi kathāṃ muhuḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम बड़े भाग्यवान् हो। भगवान्‌के प्रेमी भक्तोंमें तुम्हारा स्थान श्रेष्ठ है। तभी तो तुमने इतना सुन्दर प्रश्‍न किया है। यों तो तुम्हें बार-बार भगवान्‌की लीला-कथाएँ सुननेको मिलती हैं, फिर भी तुम उनके सम्बन्धमें प्रश्‍न करके उन्हें और भी सरस—और भी नूतन बना देते हो॥ १॥✎ 1660

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1660 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रस-मयी → रसमयी

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