श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम बड़े भाग्यवान् हो। भगवान्के प्रेमी भक्तोंमें तुम्हारा स्थान श्रेष्ठ है। तभी तो तुमने इतना सुन्दर प्रश्न किया है। यों तो तुम्हें बार-बार भगवान्की लीला-कथाएँ सुननेको मिलती हैं, फिर भी तुम उनके सम्बन्धमें प्रश्न करके उन्हें और भी सरस—और भी नूतन बना देते हो॥ १॥✎ 1660
साधु पृष्टं महाभाग त्वया भागवतोत्तम।
यन्नूतनयसीशस्य शृण्वन्नपि कथां मुहुः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम बड़े भाग्यवान् हो। भगवान्के प्रेमी भक्तोंमें तुम्हारा स्थान श्रेष्ठ है। तभी तो तुमने इतना सुन्दर प्रश्न किया है। यों तो तुम्हें बार-बार भगवान्की लीला-कथाएँ सुननेको मिलती हैं, फिर भी तुम उनके सम्बन्धमें प्रश्न करके उन्हें और भी सरस—और भी नूतन बना देते हो॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 210) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)