श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

सतामयं सारभृतां निसर्गो

यदर्थवाणीश्रुतिचेतसामपि ।

प्रतिक्षणं नव्यवदच्युतस्य यत्

स्त्रिया विटानामिव साधुवार्ता॥ २

satāmayaṃ sārabhṛtāṃ nisargo

yadarthavāṇīśruticetasāmapi |

pratikṣaṇaṃ navyavadacyutasya yat

striyā viṭānāmiva sādhuvārtā|| 2

अर्थ

रसिक संतोंकी वाणी, कान और हृदय भगवान्‌की लीलाके गान, श्रवण और चिन्तनके लिये ही होते हैं—उनका यह स्वभाव ही होता है कि वे क्षण-प्रतिक्षण भगवान्‌की लीलाओंको अपूर्व रसमयी और नित्य-नूतन अनुभव करते रहें—ठीक वैसे ही, जैसे लम्पट पुरुषोंको स्त्रियोंकी चर्चामें नया-नया रस जान पड़ता है॥ २॥✎ 1660

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1660 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रस-मयी → रसमयी

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