परीक्षित्! तुम एकाग्र चित्तसे श्रवण करो। यद्यपि भगवान्की यह लीला अत्यन्त रहस्यमयी है, फिर भी मैं तुम्हें सुनाता हूँ। क्योंकि दयालु आचार्यगण अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त रहस्य भी बतला दिया करते हैं॥ ३॥✎ 1660
शृणुष्वावहितो राजन्नपि गुह्यं वदामि ते।
ब्रूयुः स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्यमप्युत॥ ३
परीक्षित्! तुम एकाग्र चित्तसे श्रवण करो। यद्यपि भगवान्की यह लीला अत्यन्त रहस्यमयी है, फिर भी मैं तुम्हें सुनाता हूँ। क्योंकि दयालु आचार्यगण अपने प्रेमी शिष्यको गुप्त रहस्य भी बतला दिया करते हैं॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.13.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 210) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/13/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)