श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

ततः कृष्णो मुदं कर्तुं तन्मातॄणां च कस्य च।

उभयायितमात्मानं चक्रे विश्‍वकृदीश्‍वरः॥ १८

tataḥ kṛṣṇo mudaṃ kartuṃ tanmātṝṇāṃ ca kasya ca|

ubhayāyitamātmānaṃ cakre viśvakṛdīśvaraḥ|| 18

अर्थ

अब भगवान् श्रीकृष्णने बछड़ों और ग्वालबालोंकी माताओंको तथा ब्रह्माजीको भी आनन्दित करनेके लिये अपने-आपको ही बछड़ों और ग्वालबालों—दोनोंके रूपमें बना लिया*। क्योंकि वे ही तो सम्पूर्ण विश्‍वके कर्ता सर्वशक्तिमान् ईश्‍वर हैं॥ १८॥✎ 1419 2069

टिप्पणियाँ

  1. *

    भगवान् सर्वसमर्थ हैं। वे ब्रह्माजीके चुराये हुए ग्वालबाल और बछड़ोंको ला सकते थे। किन्तु इससे ब्रह्माजीका मोह दूर न होता और वे भगवान्‌की उस दिव्य मायाका ऐश्‍वर्य न देख सकते, जिसने उनके विश्‍वकर्ता होनेके अभिमानको नष्ट किया। इसीलिये भगवान् उन्हीं ग्वालबाल और बछड़ोंको न लाकर स्वयं ही वैसे ही एवं उतने ही ग्वालबाल और बछड़े बन गये।

    (मुद्रित पृष्ठ 213)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1419 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छींके → छीके
  • #2069 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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