श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.61

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तत्रोद्वहत् पशुपवंशशिशुत्वनाट्यं

ब्रह्माद्वयं परमनन्तमगाधबोधम्।

वत्सान् सखीनिव पुरा परितो विचिन्व-

देकं सपाणिकवलं परमेष्ठ्यचष्ट॥ ६१

tatrodvahat paśupavaṃśaśiśutvanāṭyaṃ

brahmādvayaṃ paramanantamagādhabodham|

vatsān sakhīniva purā parito vicinva-

dekaṃ sapāṇikavalaṃ parameṣṭhyacaṣṭa|| 61

अर्थ

ब्रह्माजीने वृन्दावनका दर्शन करनेके बाद देखा कि अद्वितीय परब्रह्म गोपवंशके बालकका-सा नाट्य कर रहा है। एक होनेपर भी उसके सखा हैं, अनन्त होनेपर भी वह इधर-उधर घूम रहा है और उसका ज्ञान अगाध होनेपर भी वह अपने ग्वालबाल और बछड़ोंको ढूँढ़ रहा है। ब्रह्माजीने देखा कि जैसे भगवान् श्रीकृष्ण पहले अपने हाथमें दही-भातका कौर लिये उन्हें ढूँढ़ रहे थे, वैसे ही अब भी अकेले ही उनकी खोजमें लगे हैं॥ ६१॥✎ 1662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1662 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

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