श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.62

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

दृष्ट्वा त्वरेण निजधोरणतोऽवतीर्य

पृथ्व्यां वपुः कनकदण्डमिवाभिपात्य।

स्पृष्ट्वा चतुर्मुकुटकोटिभिरङ्‌घ्रियुग्मं

नत्वा मुदश्रुसुजलैरकृताभिषेकम्॥ ६२

dṛṣṭvā tvareṇa nijadhoraṇato'vatīrya

pṛthvyāṃ vapuḥ kanakadaṇḍamivābhipātya|

spṛṣṭvā caturmukuṭakoṭibhiraṅghriyugmaṃ

natvā mudaśrusujalairakṛtābhiṣekam|| 62

अर्थ

भगवान्‌को देखते ही ब्रह्माजी अपने वाहन हंसपरसे कूद पड़े और सोनेके समान चमकते हुए अपने शरीरसे पृथ्वीपर दण्डकी भाँति गिर पड़े। उन्होंने अपने चारों मुकुटोंके अग्रभागसे भगवान्‌के चरण-कमलोंका स्पर्श करके नमस्कार किया और आनन्दके आँसुओंकी धारासे उन्हें नहला दिया॥ ६२॥✎ 1662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1662 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

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