श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अद्यैव त्वदृतेऽस्य किं मम न ते मायात्वमादर्शित-

मेकोऽसि प्रथमं ततो व्रजसुहृद् वत्साः समस्ता अपि।

तावन्तोऽसि चतुर्भुजास्तदखिलैः साकं मयोपासिता-

स्तावन्त्येव जगन्त्यभूस्तदमितं ब्रह्माद्वयं शिष्यते॥ १८

adyaiva tvadṛte'sya kiṃ mama na te māyātvamādarśita-

meko'si prathamaṃ tato vrajasuhṛd vatsāḥ samastā api|

tāvanto'si caturbhujāstadakhilaiḥ sākaṃ mayopāsitā-

stāvantyeva jagantyabhūstadamitaṃ brahmādvayaṃ śiṣyate|| 18

अर्थ

उस दिनकी बात जाने दीजिये, आजकी ही लीजिये। क्या आज आपने मेरे सामने अपने अतिरिक्त सम्पूर्ण विश्‍वको अपनी मायाका खेल नहीं दिखलाया है? पहले आप अकेले थे। फिर सम्पूर्ण ग्वालबाल, बछड़े और छड़ी-छीके भी आप ही हो गये। उसके बाद मैंने देखा कि आपके वे सब रूप चतुर्भुज हैं और मेरे सहित सब-के-सब तत्त्व उनकी सेवा कर रहे हैं। आपने अलग-अलग उतने ही ब्रह्माण्डोंका रूप भी धारण कर लिया था, परन्तु अब आप केवल अपरिमित अद्वितीय ब्रह्मरूपसे ही शेष रह गये हैं॥ १८॥✎ 1421

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1421 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): छड़ी-छींके → छड़ी-छीके

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