श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अजानतां त्वत्पदवीमनात्म-

न्यात्माऽऽत्मना भासि वितत्य मायाम्।

सृष्टाविवाहं जगतो विधान

इव त्वमेषोऽन्त इव त्रिनेत्रः॥ १९

ajānatāṃ tvatpadavīmanātma-

nyātmā''tmanā bhāsi vitatya māyām|

sṛṣṭāvivāhaṃ jagato vidhāna

iva tvameṣo'nta iva trinetraḥ|| 19

अर्थ

जो लोग अज्ञानवश आपके स्वरूपको नहीं जानते, उन्हींको आप प्रकृतिमें स्थित जीवके रूपसे प्रतीत होते हैं और उनपर अपनी मायाका परदा डालकर सृष्टिके समय मेरे (ब्रह्मा) रूपसे, पालनके समय अपने (विष्णु) रूपसे और संहारके समय रुद्रके रूपमें प्रतीत होते हैं॥ १९॥

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