॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.33
एषां तु भाग्यमहिमाच्युत तावदास्ता-
मेकादशैव हि वयं बत भूरिभागाः।
एतद्धृषीकचषकैरसकृत् पिबामः
शर्वादयोऽङ्घ्र्युदजमध्वमृतासवं ते॥ ३३✎ 2071
eṣāṃ tu bhāgyamahimācyuta tāvadāstā-
mekādaśaiva hi vayaṃ bata bhūribhāgāḥ|
etaddhṛṣīkacaṣakairasakṛt pibāmaḥ
śarvādayo'ṅghryudajamadhvamṛtāsavaṃ te|| 33
अर्थ
हे अच्युत! इन व्रजवासियोंके सौभाग्यकी महिमा तो अलग रही—मन आदि ग्यारह इन्द्रियोंके अधिष्ठातृदेवताके रूपमें रहनेवाले महादेव आदि हम लोग बड़े ही भाग्यवान् हैं। क्योंकि इन व्रजवासियोंकी मन आदि ग्यारह इन्द्रियोंको प्याले बनाकर हम आपके चरणकमलोंका अमृतसे भी मीठा, मदिरासे भी मादक मधुर मकरन्दरस पान करते रहते हैं। जब उसका एक-एक इन्द्रियसे पान करके हम धन्य-धन्य हो रहे हैं, तब समस्त इन्द्रियोंसे उसका सेवन करनेवाले व्रजवासियोंकी तो बात ही क्या है॥ ३३॥