श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.34

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तद् भूरिभाग्यमिह जन्म किमप्यटव्यां

यद् गोकुलेऽपि कतमाङ्‌घ्रिरजोऽभिषेकम्।

यज्जीवितं तु निखिलं भगवान् मुकुन्द-

स्त्वद्यापि यत्पदरजः श्रुतिमृग्यमेव॥ ३४

tad bhūribhāgyamiha janma kimapyaṭavyāṃ

yad gokule'pi katamāṅghrirajo'bhiṣekam|

yajjīvitaṃ tu nikhilaṃ bhagavān mukunda-

stvadyāpi yatpadarajaḥ śrutimṛgyameva|| 34

अर्थ

प्रभो! इस व्रजभूमिके किसी वनमें और विशेष करके गोकुलमें किसी भी योनिमें जन्म हो जाय, यही हमारे लिये बड़े सौभाग्यकी बात होगी! क्योंकि यहाँ जन्म हो जानेपर आपके किसी-न-किसी प्रेमीके चरणोंकी धूलि अपने ऊपर पड़ ही जायगी। प्रभो! आपके प्रेमी व्रजवासियोंका सम्पूर्ण जीवन आपका ही जीवन है। आप ही उनके जीवनके एकमात्र सर्वस्व हैं। इसलिये उनके चरणोंकी धूलि मिलना आपके ही चरणोंकी धूलि मिलना है और आपके चरणोंकी धूलिको तो श्रुतियाँ भी अनादि कालसे अबतक ढूँढ़ ही रही हैं॥ ३४॥✎ 1422 2072

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1422 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राक्षसोंको → राक्षसोंके
  • #2072 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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