प्रभो! आप विश्वके बखेड़ेसे सर्वथा रहित हैं, फिर भी अपने शरणागत भक्तजनोंको अनन्त आनन्द वितरण करनेके लिये पृथ्वीमें अवतार लेकर विश्वके समान ही लीला-विलासका विस्तार करते हैं॥ ३७॥✎ 14222072
प्रपञ्चं निष्प्रपञ्चोऽपि विडम्बयसि भूतले।
प्रपन्नजनतानन्दसन्दोहं प्रथितुं प्रभो॥ ३७
प्रभो! आप विश्वके बखेड़ेसे सर्वथा रहित हैं, फिर भी अपने शरणागत भक्तजनोंको अनन्त आनन्द वितरण करनेके लिये पृथ्वीमें अवतार लेकर विश्वके समान ही लीला-विलासका विस्तार करते हैं॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 227) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/14/37/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1422 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राक्षसोंको → राक्षसोंके