मेरे स्वामी! बहुत कहनेकी आवश्यकता नहीं—जो लोग आपकी महिमा जानते हैं, वे जानते रहें; मेरे मन, वाणी और शरीर तो आपकी महिमा जाननेमें सर्वथा असमर्थ हैं॥ ३८॥✎ 14222072
जानन्त एव जानन्तु किं बहूक्त्या न मे प्रभो।
मनसो वपुषो वाचो वैभवं तव गोचरः॥ ३८
मेरे स्वामी! बहुत कहनेकी आवश्यकता नहीं—जो लोग आपकी महिमा जानते हैं, वे जानते रहें; मेरे मन, वाणी और शरीर तो आपकी महिमा जाननेमें सर्वथा असमर्थ हैं॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 227) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/14/38/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1422 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): राक्षसोंको → राक्षसोंके