श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

बर्हप्रसूननवधातुविचित्रितांगः

प्रोद्दामवेणुदलशृंगरवोत्सवाढ्यः ।

वत्सान् गृणन्‍ननुगगीतपवित्रकीर्ति-

र्गोपीदृगुत्सवदृशिः प्रविवेश गोष्ठम्॥ ४७

barhaprasūnanavadhātuvicitritāṃgaḥ

proddāmaveṇudalaśṛṃgaravotsavāḍhyaḥ |

vatsān gṛṇannanugagītapavitrakīrti-

rgopīdṛgutsavadṛśiḥ praviveśa goṣṭham|| 47

अर्थ

श्रीकृष्णके सिरपर मोरपंखका मनोहर मुकुट और घुँघराले बालोंमें सुन्दर-सुन्दर महँ-महँ महँकते हुए पुष्प गुँथ रहे थे। नयी-नयी रंगीन धातुओंसे श्याम शरीरपर चित्रकारी की हुई थी। वे चलते समय रास्तेमें उच्च स्वरसे कभी बाँसुरी, कभी पत्ते और कभी सिंगी बजाकर वाद्योत्सवमें म‌ग्‍न हो रहे हैं। पीछे-पीछे ग्वालबाल उनकी लोकपावन कीर्तिका गान करते जा रहे हैं। कभी वे नाम ले-लेकर अपने बछड़ोंको पुकारते, तो कभी उनके साथ लाड़-लड़ाने लगते। मार्गके दोनों ओर गोपियाँ खड़ी हैं; जब वे कभी तिरछे नेत्रोंसे उनकी नजरमें नजर मिला देते हैं, तब गोपियाँ आनन्द-मुग्ध हो जाती हैं। इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने गोष्ठमें प्रवेश किया॥ ४७॥✎ 1423

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1423 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महकते → महँकते

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