॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.61
एवं विहारैः कौमारैः कौमारं जहतुर्व्रजे।
निलायनैः सेतुबन्धैर्मर्कटोत्प्लवनादिभिः॥ ६१
evaṃ vihāraiḥ kaumāraiḥ kaumāraṃ jahaturvraje|
nilāyanaiḥ setubandhairmarkaṭotplavanādibhiḥ|| 61
अर्थ
परीक्षित्! इस प्रकार श्रीकृष्ण और बलरामने कुमार-अवस्थाके अनुरूप आँखमिचौनी, सेतु-बन्धन, बन्दरोंकी भाँति उछलना-कूदना आदि अनेकों लीलाएँ करके अपनी कुमार-अवस्था व्रजमें ही त्याग दी॥ ६१॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
ब्रह्मस्तुतिर्नाम चतुर्दशोऽध्यायः॥ १४॥