धेनुकासुरका उद्धार और ग्वालबालोंको कालियनागके विषसे बचाना
श्रीशुक उवाच
ततश्च पौगण्डवयःश्रितौ व्रजे
बभूवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ।
गाश्चारयन्तौ सखिभिः समं पदै-
र्वृन्दावनं पुण्यमतीव चक्रतुः॥ १
tataśca paugaṇḍavayaḥśritau vraje
babhūvatustau paśupālasammatau|
gāścārayantau sakhibhiḥ samaṃ padai-
rvṛndāvanaṃ puṇyamatīva cakratuḥ|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब बलराम और श्रीकृष्णने पौगण्ड-अवस्थामें अर्थात् छठे वर्षमें प्रवेश किया था। अब उन्हें गौएँ चरानेकी स्वीकृति मिल गयी। वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावनमें जाते और अपने चरणोंसे वृन्दावनको अत्यन्त पावन करते॥ १॥
ततश्च पौगण्डवयःश्रितौ व्रजे
बभूवतुस्तौ पशुपालसम्मतौ।
गाश्चारयन्तौ सखिभिः समं पदै-
र्वृन्दावनं पुण्यमतीव चक्रतुः॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! अब बलराम और श्रीकृष्णने पौगण्ड-अवस्थामें अर्थात् छठे वर्षमें प्रवेश किया था। अब उन्हें गौएँ चरानेकी स्वीकृति मिल गयी। वे अपने सखा ग्वालबालोंके साथ गौएँ चराते हुए वृन्दावनमें जाते और अपने चरणोंसे वृन्दावनको अत्यन्त पावन करते॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.15.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 231) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/1/