श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणो

भुंजान एवात्मकृतं विपाकम्।

हृद्वाग्वपुर्भिर्विदधन्‍नमस्ते

जीवेत यो मुक्तिपदे स दायभाक्॥ ८

tatte'nukampāṃ susamīkṣamāṇo

bhuṃjāna evātmakṛtaṃ vipākam|

hṛdvāgvapurbhirvidadhannamaste

jīveta yo muktipade sa dāyabhāk|| 8

अर्थ

इसलिये जो पुरुष क्षण-क्षणपर बड़ी उत्सुकतासे आपकी कृपाका ही भलीभाँति अनुभव करता रहता है और प्रारब्धके अनुसार जो कुछ सुख या दुःख प्राप्त होता है उसे निर्विकार मनसे भोग लेता है, एवं जो प्रेमपूर्ण हृदय, गद्गद वाणी और पुलकित शरीरसे अपनेको आपके चरणोंमें समर्पित करता रहता है—इस प्रकार जीवन व्यतीत करनेवाला पुरुष ठीक वैसे ही आपके परम पदका अधिकारी हो जाता है, जैसे अपने पिताकी सम्पत्तिका पुत्र!॥ ८॥

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