श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

पश्येश मेऽनार्यमनन्त आद्ये

परात्मनि त्वय्यपि मायिमायिनि।

मायां वितत्येक्षितुमात्मवैभवं

ह्यहं कियानैच्छमिवार्चिर‌ग्‍नौ॥ ९

paśyeśa me'nāryamananta ādye

parātmani tvayyapi māyimāyini|

māyāṃ vitatyekṣitumātmavaibhavaṃ

hyahaṃ kiyānaicchamivārciragnau|| 9

अर्थ

प्रभो! मेरी कुटिलता तो देखिये। आप अनन्त आदिपुरुष परमात्मा हैं और मेरे-जैसे बड़े-बड़े मायावी भी आपकी मायाके चक्रमें हैं। फिर भी मैंने आपपर अपनी माया फैलाकर अपना ऐश्‍वर्य देखना चाहा! प्रभो! मैं आपके सामने हूँ ही क्या। क्या आगके सामने चिनगारीकी भी कुछ गिनती है?॥ ९॥

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