श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

तन्मंजुघोषालिमृगद्विजाकुलं

महन्मनःप्रख्यपयःसरस्वता ।

वातेन जुष्टं शतपत्रगन्धिना

निरीक्ष्य रन्तुं भगवान् मनो दधे॥ ३

tanmaṃjughoṣālimṛgadvijākulaṃ

mahanmanaḥprakhyapayaḥsarasvatā |

vātena juṣṭaṃ śatapatragandhinā

nirīkṣya rantuṃ bhagavān mano dadhe|| 3

अर्थ

उस वनमें कहीं तो भौंरे बड़ी मधुर गुंजार कर रहे थे, कहीं झुंड-के-झुंड हरिन चौकड़ी भर रहे थे और कहीं सुन्दर-सुन्दर पक्षी चहक रहे थे। बड़े ही सुन्दर-सुन्दर सरोवर थे, जिनका जल महात्माओंके हृदयके समान स्वच्छ और निर्मल था। उनमें खिले हुए कमलोंके सौरभसे सुवासित होकर शीतल-मन्द-सुगन्ध वायु उस वनकी सेवा कर रही थी। इतना मनोहर था वह वन कि उसे देखकर भगवान्‌ने मन-ही-मन उसमें विहार करनेका संकल्प किया॥ ३॥

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