श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

स तत्र तत्रारुणपल्लवश्रिया

फलप्रसूनोरुभरेण पादयोः।

स्पृशच्छिखान् वीक्ष्य वनस्पतीन् मुदा

स्मयन्‍निवाहाग्रजमादिपूरुषः ॥ ४

sa tatra tatrāruṇapallavaśriyā

phalaprasūnorubhareṇa pādayoḥ|

spṛśacchikhān vīkṣya vanaspatīn mudā

smayannivāhāgrajamādipūruṣaḥ || 4

अर्थ

पुरुषोत्तम भगवान्‌ने देखा कि बड़े-बड़े वृक्ष फल और फूलोंके भारसे झुककर अपनी डालियों और नूतन कोंपलोंकी लालिमासे उनके चरणोंका स्पर्श कर रहे हैं, तब उन्होंने बड़े आनन्दसे कुछ मुसकरात हुए-से अपने बड़े भाई बलरामजीसे कहा॥ ४॥

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